Literature
धर्म !
धर धीरज किया था जो कर्म ,
सार्वत्रिक था जो नर्म ,
किया स्थापित जिसने संस्कृति को ,
संजोया जिसने पुरखो के स्मृति ,
बना दिया विकृति किसी ने
इस पुरखो के सुकृति को,
बाट दिया इस धरा के इंसान को,
पहुंचाया कुछ को शमशान को कुछ को कब्रिस्तान को ।
हे धर्म!
ऐसा लगता है तुने बाट दिया इंसान को ।
तु तो था सरल सरेख,
आज तु आ और अपनी हालत देख ।
तु तो न बाटा था रक्त को, वक्त को ।
आज तु आ और अपनी हालत देख ।
🖋️आदित्य सिंह
श्रेणी: जीवन